हमे कर्म से पहले फल की चिंता क्यू होती है 

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 “अपने सुख-दुख का कर्ता और नियंता खुद बनो

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मित्रो आज मैं ख़लील जिब्रान साहब का कहा मैं पढा ‘‘हमलोग अपने सुखों और दुखों का अनुभव करने से बहुत पहले ही उनका चुनाव कर लेते हैं” अपने कर्मफल के सिद्धांत के अनुसार हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल पाते हैं,

जो बीज हम खेतो में बोते हैं उसी बीज से उत्पन्न पेड़ के फल हमें प्राप्त होते हैं,जिस प्रकार हमें अपने बोए गए बीजों के फूल-फल अवश्य ही मिलते हैं ठीक उसी प्रकार हमारे कर्म रूपी बीजों के फल भी अवश्य ही हमें देर-सवेरे मिलते हैं,मित्रो कर्म रूपी बीज हमारे सुख-दुख या हर्ष-विषाद का मूल हैं,हमारा वर्तमान इन्हीं के कारण इस अवस्था में है,किसी भी कार्य की पहली रूपरेखा बनती है,

 

उसके बाद विचार की वास्तविकता में परिवर्तित होता है,इस प्रकार मन में निर्मित मानचित्र द्वारा ही उत्पत्ति होती है हमारे कर्मों की,अर्थात् कर्म की उत्पत्ति हमारी सोच,हमारे चिंतन,हमारे संकल्पों का परिणाम मात्र है,


एक बार एक व्यक्ति चूहे मारने की दवा खरीदने बाजार गया, दुकानदार से दवा ली,पैसे दिये और घर की तरफ चल दिया,रास्ते में मन में न जाने क्या ख़याल आया कि वापस दुकान पर गया और दुकानदार से पूछा,भाई एक बात बताओ,दवा से चूहे मरेंगे तो पाप लगेगा,अब ये बताओ कि पाप तुम्हें लगेगा या मुझे ?

 

दुकानदार ने कहा कि पाप-पुण्य तो तब लगेगा जब चूहे मरेंगे क्योंकि आज तक इस दवा से कोई चूहा नहीं मरा है,भगवान कृष्ण कहते हैं ‘‘सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत”सहज-स्वाभाविक कर्म दोषयुक्त होने पर भी नहीं त्यागना चाहिये,मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह कर्म करे और फल अथवा परिणाम की चिंता न करे लेकिन हमारे मनों में परिणाम की आशंका पहले से ही घर कर जाती है 


जिससे न तो कर्म का मूल अर्थात् विचार ही सहज रह पाता है और न ही सहज रूप से कर्म का निष्पादन हो पाता है,एक भाव और हमारे मन में व्याप्त रहता है,और वो है कर्ता भाव,मैं सबको खिलाता-पिलाता हूँ,मैं किसी का नहीं खाता, मैं सबको आमंत्रित करता हूँ और सबकी ख़ातिरदारी करता हूँ लेकिन मैं हर ऐरे-ग़ैरे के यहाँ नहीं जाता,यह अहंकार और कर्ता भाव की पराकाष्ठा है ये समाजिक ज़िवन में गलत है,

 

प्रभु की ऐसी ही इच्छा है यह सोचकर सहज-स्वाभाविक कार्य सहज-स्वाभाविक ढंग से कीजिए,प्रभु की ऐसी ही इच्छा है यह सोचकर हर परिणाम को स्वीकार कीजिए,राग-द्वेष से मुक्त होकर,निर्लिप्त होकर सहज-स्वाभाविक कर्म निष्काम भाव से कीजिए कर्मों के बंधन से ही मुक्त हो जाएँगे,कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाना ही सुख-दुख अथवा मानापमान से ऊपर उठ जाना है,यही मुक्ति है, मोक्ष है निर्वाण है।
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